इंसान बनते है।

इंसानियत कोई जाति नहीं है। यह कोई व्यक्ति या लोग नहीं है। यह कुछ ऐसा है जो हम खुद से पूछते हैं। इंसानियत का सवाल है। क्या हम इंसान को निष्पक्ष रूप से एक समान देखेंगे? क्या हम अपना भरोसा प्यार और सिर्फ प्यार पर रखेंगे? हम इंसानियत के इस सवाल का जवाब अपने दम … Continue reading इंसान बनते है।

जीवन का खेल

जीत की ओर इंसान ऐसे भाग रहा है, मानो जीत नहीं तो ज़िन्दगी नहीं।दौड़ एक दूसरे से आगे जाने की दौड़ नीचे से ऊपर जाने कीदौड़ ग़रीबी से आमिरी की सीढ़ी चढ़ने की,दौड़ परेशानियों को पीछे छोड़ देने की।जीतने की धुन में इंसान ये क्यों भुल रहा है कि,हम ज़िन्दगी जीने का सलीक़ा तो बदल … Continue reading जीवन का खेल

रिश्तों का खेल

ये रिश्तों का खेल कैसा है, कभी कुछ तो कभी कुछ बन जाता है। कभी जो बेटी थी वह बहु बन जाती है। कभी जो बेटा था वह दामाद बन जाता है। परंतु दोनों के रिश्ते में बस इतना फ़र्क़ है की, बेटी को बस बहु बन के रहने को बोला जाता है। बेटा घर … Continue reading रिश्तों का खेल

Humanity or money?????????

We live in a world where..........Some are poor and some are rich. To make money there are so many posters on the walls. However, the wall which is built in the hearts of people is for that money only. What an irony!!!!!!!!!!! Everyone in this world is rich and poor. Some people are rich from … Continue reading Humanity or money?????????

समय की विडंबना

क्या विडंबना है आज के समय की, जो दो वक़्त की रोटी के लिए तरस्ता था। और जिसको बिन मांगे रोटी मिल जाती थी। आज वह दोनों ही सांसें बचाने के लिए, ऑक्सीजन खरीदने को कतार में खड़े है। आज वह भगवान से बस यही मांगता है की, कहीं से उनको ऑक्सीजन मिल जाए। ताकि … Continue reading समय की विडंबना

शिकायतें

शिकायतें बहुत है कहाँ कितने शिकायतें दर्ज करोगे। कभी धरती पर रहने वाले इंसानों से करते हो। तो कभी उस अनदेखे भगवान से करते हो। धूप ज़्यादा हुई तो शिकायत, ठंड ज़्यादा हुई तो शिकायत। सुखा पड़ गया तो शिकायत, बाढ़ आ गया तो शिकायत। इन शिकायतों का सिलसिला उम्र भर चलता रहता है। तो … Continue reading शिकायतें

गोते लगाना

जैसे समंदर में मछलियाँ गोते लगाती है। वैसे ही आसमान में सूरज, चांद और तारें गोते लगाते है। हर प्राणी जीवन में गोते ही लगाते रहते है। इंसान अक्सर भावनाओं में गोते लगाते रहते है। कोई सुख के सागर में, तो कोई दुख के दरिया में गोते लगाता है। कोई सच के नदी में, तो … Continue reading गोते लगाना

परिवार

लोग भूल क्यों जाते हैं कि परिवार से बात करना भी ज़रूरी है, क्यों कि हम एक साथ रहते है तभी तो परिवार कहलाते है। आप समझते नहीं या समझना नहीं चाहते है। क्यों कि, ये समझने और समझाने के चक्कर में उम्र बीत गई। पर आज तक ना आप समझे ना हम समझा सके … Continue reading परिवार

दिखावे का भूख

भूख तो सब को लगती है। किसी की भूख पेट की होती है, तो किसी की भूख पैसे की होती है। किसी की भूख शक्ति की होती है, तो किसी की भूख भक्ति की होती है। किसी की भूख प्रेम की होती है, तो किसी की भूख नाम कमाने की होती है। तो अब आप … Continue reading दिखावे का भूख

छात्र

हम मनुष्य जीवन भर एक छात्र के किरदार में होते है। हमारे जीवन में हम जितने भी मनुष्य या वस्तु से जुड़े होते है। उन सब से हमेशा कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। जैसे की दिन का शुरुवात करने वाला सूरज, वो हमे सिख देता है कि जीवन में कुछ भी हो जाए, … Continue reading छात्र