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HUMANITY

मंजिल

मंजिल का पता किसके पास है सब तो बस यूं ही चलते जा रहे हैं।
किसी की मंजिल आसमान तो किसी की दो वक्त की रोटी है।

जैसे पतंग को नहीं पता की उसकी मंजिल कहां है।
वैसे ही धागे को कहां पता की वो कब पतंग से जुदा हो जाए।

जैसे जिंदगी को कहां पता की उसकी सफर कितनी लंबी है।
वैसे ही सांसों को कहां पता की वो कब जिंदगी से जुदा हो जाए।

जैसे सूरज को कहां पता की उसकी किरणे कितने वक्त के लिए हैं।
वैसे ही चांद को कहां पता की वो कब बादलों के पीछे छिप जाए।

मंजिल का पता किसके पास है सब तो बस यूं ही चलते जा रहें हैं।