ये रिश्तों का खेल कैसा है, कभी कुछ तो कभी कुछ बन जाता है।
कभी जो बेटी थी वह बहु बन जाती है।
कभी जो बेटा था वह दामाद बन जाता है।
परंतु दोनों के रिश्ते में बस इतना फ़र्क़ है की,
बेटी को बस बहु बन के रहने को बोला जाता है।
बेटा घर जमाई बन जाए तो बवाल मच जाता है।
कभी जो पति – पत्नी थे वह माता – पिता बन जाते है।
कभी जो माता – पिता थे वह सास – ससुर बन जाते है।
परंतु दोनों के रिश्तों में बस इतना फ़र्क़ है की,
पति – पत्नी को बस माता – पिता बन के रहने को बोला जाता है।
माता – पिता अगर सास – ससुर बन जाए तो सोच बदल जाती है।
रिश्ता जो भी हो हर रिश्ते की अपनी जीवन रेखा है।
जैसे की बेटी बहु बनी तो पराई हो जाती है।
पर बेटा दामाद बनकर भी पराया नहीं हो जाता है।
जैसे पति – पत्नी माता – पिता बन जाए तो जिम्मेदारी भाड़ जाती है।
पर माता – पिता सास – ससुर बन जाए तो जिम्मेदारी कम हो जाती है।
बच्चे बड़े हो जाते है और उनका बचपन घूम हो जाता है।
उम्र बड़ जाती है और उनका बचपन वापस आ जाता है।
परंतु दोनों के रिश्तों में बस इतना फ़र्क़ है की,
बच्चों का बचपन तो सबको प्यारी यादें दे जाती है।
और वही बुजुर्गों का बचपन कुछ को परेशानी लगने लगती है।
Bahut achchi panktiyan
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Thank you @ratan singh rathore
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Always welcome #A Rajput’s respect for a Brahmin girl
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Human is the best word neither rajput nor brahmin. Because humanity is greatest of all.
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